*लेख क्र.-9*
साथिओं आज का हमारा मुख्य बिंदु है-
*मेरा गांव-गारेंगा*.
गांव शब्द सुनते ही हम अपने मन में एक तस्वीर सी बना लेते हैं – कमर पे घड़ा रखे कुँए से पानी भरकर आती औरतें, खेतों से हल–बैल लेकर लौटते किसान, गांव के बाहर के मैदान में गिल्ली–डंडा खेलते बच्चे, दिए और चिमनी की रोशन में बच्च्चों को सुलातीं दादी मां, आँगन से उठाते चूल्हे के धुएँ की सोंधी खुशबू और दूर खेतों से आती किसी ट्यूबवेल एवं धान मील(चटया मील हल्बी-भतरी बोली मे) चलने की आवाज़|यदि हम भी मेट्रोपोलिटन सिटीज़ में पैदा हुए होते तो शायद गारेंगा की यही तस्वीर हमारे मन में भी रहती। और शायद यह अच्छा भी होता न? आख़िर अपना गारेंगा भी तो कभी ऐसा हुआ करता होगा।
मेरे गांव का नाम *'गारेंगा‘* है। यह छत्तीसगढ के बस्तर जिले में बसा 1000–15सौ की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। इसमें से तकरीबन 4 से 500 तो 0–10 साल से कम उम्र के बच्चे ही होंगे। सब प्रकृति की देन है!! गारेंगा आधुनिकीकरण की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। शहर या क़स्बा तो नहीं कह सकते पर ऊपर की तस्वीर के अनुसार गांव भी नहीं है। गांव से नज़दीकी बाज़ार तक पक्की सड़क, सरकारी हैंडपंप, बिजली और टेलीफोन के खम्भे (टावर), ईंट के मकान, क्रिकेट खेलते बच्चे *(मडा तालाब के ठिक आगे ट्रान्सफार्मर के नीचे बैपारी बाडी मे)* और गांव के बाहर के चौक पर पॉलिटिक्स पर बहस करते किसान। बीच बीच में किसी घर से मोबाइल के रिंग की आवाज़ भी आ जायेगी। इक्का–दुक्का जींस–टीशर्ट पहने लड़कियां भी दिख जायेंगी। भले ही चेहरे और शरीर के हाव–भाव वही सलवार कुरते वाले ही होंगे।
कभी–कभी लगता है की विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है।
हम अपनी पहचान, अपनी महक, अपना अस्तित्व खो रहे हैं। मुझे सरकारी हैंडपंप के पानी में पुराने कुँए के पानी वाली मिठास कभी नहीं मिली। गर्मी मे आंडी (कुम्हार के द्वारा बनाये जाने वाला मिट्टी का गोलाकार बर्तन) मे बना मंडया पेज पीने का आनंद आधुनिक स्टील के बर्तन में कभी नहीं मिला। और खेत से तुंरत लाई गयी ‘तोरी‘ और ‘लौकी‘ की सब्जी वाला स्वाद बज़क के पनीर और मशरूम में कभी नहीं मिला।
पर कुछ चीज़ें मुझे अब भी पहले जैसी लगती हैं। जब भी गाँव के सन्दर्भ मे सोचता हूँ तो कुछ चीजें ज़रूर करने की कोशिश करता हूँ। जैसे– सर्दियों में पुआल जलाकर आग तापना (सेंकना), घर में चौकी–पलंग वाले बिस्तर पर न सोकर धान के कड़ खुफा (धान को मिंजाई के बाद बचा हुआ अवशेष) पर बिस्तर बिछाकर सोना। सचमुच वह आनंद आपको इम्पोर्टेड गद्दों में भी नहीं मिलेगा। गर्मियों में मैं बिजली रहने पर भी घर के बाहर खुले आसमान के नीचे में सोना पसंद करता हूँ *(शुक्र है की यहाँ दिल्ली जितने मच्छर नहीं हैं)*। चांदनी रात में दूर कहीं रेडियो पर कोई पुराना गीत बज रहा हो और घर के बाहर जमीन पर पर लेटकर तारों के अंतरजाल को देखते रहने के आनद को शब्दों में समेत पाना सचमुच मुश्किल है।
कभी–कभी गारेंगा में तेज़ी से हो रहे बदलावों से मन क्षुब्ध तो होता है पर पता नहीं क्यों गारेंगा के प्रति लगाव और आकर्षण दिनों–दिन और बढ़ता ही जाता है। शायद गुजरते, फिसलते पलों को ज्यादा से ज्यादा समेट लेने, जी लेने, रोक लेने की ख्वाहिश और आने वाले वक्त के प्रति मन में छुपे भय के कारण ऐसा हो।
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