Monday, April 24, 2017

मेरा गाँव गारेंगा

*लेख क्र.12*

*गाँव का जीवन या हमारे गाँव-गारेंगा*|

भारत गाँवों का देश है । हमारे देश की साठ-सत्तर प्रतिशत जनसंख्या अब भी गाँवों में ही रहती है ।
*ऐसा ही मेरा एक प्यारा गाँव है गारेंगा* |
गारेंगा का जीवन शहरी जीवन से अलग है । यहाँ की आबोहवा में जीना सचमुच आनंददायी होता है ।

गारेंगा में भारतीय संस्कृति के दर्शन होते हैं । यहाँ भारत की सदियों से चली आ रही परंपराएँ आज भी विद्‌यमान हैं । यहाँ के लोगों में अपनापन और सामाजिक घनिष्ठता पाई जाती है । यहाँ खुली धूप और हवा का आनंद उठाया जा सकता है । यहाँ हरियाली और शांति होती है ।

हमारे गाँव भारत की कृषि व्यवस्था के आधार हैं । यहाँ कृषकों का निवास है। गारेंगा के चारों ओर खेत फैले हुए हैं। खेतों में अनाज एवं सब्जियों उगाई जाती हैं । गाँवों में तालाब और कुआं हैं । इनमें संग्रहित जल से किसान फसलों की सिंचाई करते है । *गारेंगा* में खलिहान हैं । यहाँ पकी फसलों को तैयार किया जाता है ।

गारेंगा में खेती क अलावा पशुपालन, मुर्गीपालन, बकरीपालन जैसे व्यवसाय किए जाते हैं । पशुपालन से किसानों को अतिरिक्त आमदनी होती है तथा कृषि कार्य में सहायता मिलती है । पशुओं का गोबर खाद का काम करता है । पशु दूध देते हैं तथा बैल, भैंसा आदि पशु हल में जोते जाते हैं । कुछ पशु माल दुलाई में ग्रामवासियों की मदद करते हैं।

गारेंगा का जीवन शांतिदायक होता है । यहाँ के लोग शहरी लोगों की तरह निरंतर भाग-दौड़ में नहीं लगे रहते हैं । यहाँ के लोग सुबह जल्दी जगते हैं तथा रात में जल्दी सो जाते हैं । यहाँ की वायु महानगरों की वायु की तरह अत्यधिक प्रदूषित नहीं होती । यहाँ बाग-बगीचे होते हैं जहाँ के फूलों की सुगंध हवा में व्याप्त रहती है । यहाँ भीड़- भाड़ कम होने से ध्वनि प्रदूषण भी नहीं पाया जाता है ।

गारेंगा में उत्सवों और मेलों की धूम होती है । यहाँ *होली, दिवाली (दियारी) , नवाखाई, अमवश्या, दशहरा* जैसे त्योहार परंपरागत तरीके से मनाए जाते हैं । त्योहारों के अवसर पर लोग आपस में मिलते-जुलते हैं । वे लोक धुनों के नृत्य पर थिरकते हैं । गारेंगा के लोग आपसी सुख- दु:ख में एक-दूसरे का पूरा साथ देते हैं । गारेंगा के सभी लोग आपसी भाईचारे से रहते हैं । वे आपसी विवाद को अधिकतर पंचायत में ही सुलझा लेते हैं ।

*गारेंगा* में भी अब शहरों की कई सुविधाएँ पहुंच गई हैं । यहाँ बिजली, टेलीफोन, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सड़क, पानी का नल जैसी सुविधाएँ पहुँच रही हैं । गारेंगा के किसान आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रयोग करने लगे हैं । अब हल बैल के स्थान पर ज्यादातर ट्रैक्टरों से खेतों की जुताई की जाती है । गारेंगा भी अब स्कूल, सार्वजनिक भवन तथा अस्पताल हैं । गाँवों की गलियाँ पक्की कर दी गई हैं ।

गारेंगा में खान-पान की जटिलताएँ नहीं हैं । ग्रामवासी सादा भोजन करते हैं । वे ताजा दूध पीते हैं तथा हरी-ताजी सब्जियाँ खाते हैं । पीने के लिए लोग हैंडपंप, कुएँ या नलके के जल का प्रयोग करते हैं । कुछ ग्रामीण नदी-जल से अपनी प्यास बुझाते हैं (बडेजिराखाल के निवासी)

हमारे गाँव तेजी से उन्नति कर रहे हैं । ग्रामवासियों को गाँवों में ही रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है । ग्रामवासी अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति अधिक जागरूक हो गए हैं । ग्रामीण नवयुवक एवं नवयुवतियाँ शहर जाकर उच्च शिक्षा एवं नौकरी प्राप्त करती हैं । गाँव के लोग कृषि के अलावा छोटे-मोटे उद्‌योग चलाकर अपना-अपना निर्वाह कर रहे हैं । यातायात के आधुनिक साधनों की मदद से उन्हें अपना माल दूर-दराज के स्थानों तक भेजने में आसानी हो रही है ।

शहरी प्रभाव के कारण गाँवों में कुछ बदलाव जरूर दिखाई दे रहे हैं परंतु गाँवों की संस्कृति में मूलभूत अंतर नहीं आया है । गाँव आज भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के आधार स्तंभ हैं।

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Thursday, April 13, 2017

गारेंगा की प्रमुख आवश्यकताऐं!

*लेख क्र.-10*

*वास्तविक प्रत्यक्ष अनुभव गारेंगा की मूलभूत आवश्यकताऐं*

प्रत्यक्ष अनुभव जाने बिना उन समस्याओं का हल नहीं ढूंढा जा सकता। इसलिये लिखित आँकड़े अथवा पंचवर्षीय योजनाएँ *गारेंगा* को समझने का सही मापदंड नहीं हो सकते। भारत जैसे देश में, जहाँ सांस्कृतिक, प्राकृतिक तथा भौगोलिक विविधताएँ हैं, प्रत्येक प्रदेश के गाँवों की समस्याओं में भिन्नता है, पर फिर भी लगभग 80 प्रतिशत गाँवों की मूलभूत आवश्यकताएँ समान ही हैं। भारत की विकास दर में गाँव कहीं उपेक्षित ही रहे हैं। अभावों तथा मौसम की मार ने इस कृषि प्रधान देश के किसानों व अन्य ग्रामवासियों को इस तरह की समस्याओं का शिकार बना दिया है कि वे मूल धारा से विच्छिन्न एक सूखी नदी का तट हो गये हैं। सरकारी स्तर पर उपलब्ध आँकड़े केवल सरकारी काग़ज़ों पर ही इन गाँवों की उन्नति दिखाते हैं। गारेंगा की आवश्यकताओं की चर्चा अथवा विचार-विमर्श करने के पश्चात अग्रलिखित आवश्यकताएँ नजर आई जो इस प्रकार है-

*1.शिक्षा प्रचार-*
सर्वप्रथम गारेंगा वालों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है, जिससे वे जागरूक हों और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। निश्चित रूप से सरकारी विद्यालयों तथा पाठशालाओं की आवश्यकता इसके साथ जुड़ी है। अनेक मोहल्ले में  छोटे-छोटे स्कूल हैं, लेकिन उनकी दशा भी शोचनीय ही है। विशेष रूप से वे विद्यालय जो गारेंगा मुख्यमार्ग से कोषो दूर हैं, उनमें तो सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है। इसका मुख्य कारण विद्यालय का सुगम स्थानों पर न होना है। छोटे-छोटे बच्चों को विभिन्न बाधाएँ पार करते विद्यालय तक जाना पड़ता है। लड़कियों के लिये तो इतनी व्यवस्था भी विरले ही देखने को मिलती है।
मूलभूत सुविधाओं तथा इमारतों की कमी के चलते अध्यापक इन विद्यालयों में टिकना नहीं चाहते। कभी बाढ़, कभी वर्षा, कभी पाला तो कभी सर्दी के कारण ये विद्यालय बन्द रहते हैं। कभी-कभी नेताओं के दौरे के चलते कहीं जागृति आने की उम्मीद बंधती भी है तो शिक्षा के अभाव में वह सतत् जारी नहीं रह पाती। शैक्षणिक प्रचार के अभाव में लोग समस्याओं से तो परिचित हैं लेकिन उनके कारणों तक जाना उनके लिये असंभव प्राय: है। उनके जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं (भोजन, कृषि, स्वास्थ्य, परिवार) को समझाने के लिये पहले उन्हें शिक्षित करना अतिआवश्यक है।

*2.सड़क व्यवस्था-*
गारेंगा की दूसरी प्रमुख समस्या सड़कों की कमी है। गारेंगा में बसे लोग तो बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाते हैं क्योंकि यहाँ की परिवहन व्यवस्था बिल्कुल लचर है *(जैबेल से गारेंगा होते हुए केशरपाल तक का मुख्य मार्ग)*। इसका बड़ा कारण है, अच्छी सड़कों का न होना। इससे बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पहली तो यह कि जब लोग सड़कों के अभाव में शहरों तक पहुँच कर सभ्यता के विकास की झलक ही नहीं देख पाते तो उस विकास से प्रभावित होकर अपने जीवन-स्तर में सुधार करना कैसे संभव है? 
जब नेतागण और समाज-सुधारक इन गाँवों तक पहुँच ही नहीं पाते तो जागृति की लहर यहाँ तक कैसे पहुँच सकती है। ग्रामवासियों के रोज़गार की समस्या के मूल में भी कहीं-न-कहीं सड़कों की यह लचर स्थिति ही है। अधिकतर किसान अपनी फसल को लेकर व्यापारिक मंडियों तक नहीं पहुँच पाते, और रात-दिन खेतों में परिश्रम करने के बावजूद इस परिश्रम का लाभ नहीं उठा पाते। इसके परिणामस्वरूप वे ग़रीबी और भुखमरी की मार झेलते हैं। यही कारण है कि आज भी किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले भारत में ही देखने को मिलते हैं।
जहाँ सड़कें नहीं हैं, वहाँ यातायात के साधन भी सदियों पुराने ही हैं, क्योंकि पगडंडियों पर बैलगाड़ियाँ ही चल पाती हैं। मौसम खराब होने पर, बारिश तथा बाढ़ जैसी स्थिति में तो इन गारेंगा तक पहुँचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। देश की आज़ादी के समय तो स्थिति और भी अधिक शोचनीय थी।
जहाँ कहीं जिला बोर्ड के सदस्य रहते हैं, वहाँ तो फिर भी कुछ सड़कों की मरम्मत की जाती है, बाकी जगह तो आज भी सड़क बनने की आस लिए बैठें हैं।

*3.जलाशय-*
जलाशय भी गाँव की एक मूल समस्या है। गाँवों में पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। पहले तो जनसंख्या के अनुपात को देखते हुए कुएँ वैसे ही कम हैं और जो हैं भी
जलाशय भी गाँव की एक मूल समस्या है। गाँवों में पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। पहले तो जनसंख्या के अनुपात को देखते हुए कुएँ वैसे ही कम हैं और जो हैं भी वे पक्की जगत् के बिना हैं।  इतना ही नहीं, पक्की जगत् के कुएँ भी लोगों की अज्ञानता के कारण स्वच्छ नहीं हैं। बरतनों की अशुद्धता, कुएँ के पानी का पीने के अतिरिक्त अन्य कार्यों में प्रयोग करने तथा सफ़ाई न रखने के कारण कुओं का जल अस्वच्छ हो जाता है। जहाँ कहीं तालाब और जलाशय भी हैं, वहाँ भी स्थिति बेहतर नहीं है। खेतों की सिंचाई के लिये भी जगह-जगह जलाशय की आवश्यकता है। *गारेंगा* मे आज भी गाँव वालों को कोसों दूर से पानी लाना पड़ता है।
पहले की तरह परमार्थी लोग अब नहीं हैं।

*4.दवाखाने-*
*गारेंगा* की आवश्यकताओं सूची में चौथे स्थान पर दवाखाने है।
जो गाँव शहरों के निकट होते हैं, उनमें फिर भी दवाखानों की सुविधा उपलब्ध हो जाती है लेकिन *_Garenga_*में बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में समय रहते उचित चिकित्सा की सुविधा न मिलने के कारण पीड़ित की मौत तक हो जाती है। इतना  ही  नहीं, बहुत  से बच्चे भी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में अकाल मृत्यु के शिकार बनते हैं। शहरों के निकट के गाँव में तो फिर भी सुविधाएँ मिलती हैं पर दूरवर्ती गाँवों में दवाखानों का अकाल है।

*5.बाढ़ से उत्पन्न समस्याएँ-*
गाँव की पाँचवीं आवश्यकत है -नदियों की बाढ़ और महामारियों से बचने के स्थायी उपायों की। यद्यपि  किसानों के लिये वर्षा आज भी सिंचाई का प्रमुख स्रोत है, पर अतिवृष्टि उनके जीवन और कृषि के लिये साक्षात प्रलय का ही रूप होती है। प्रत्येक वर्ष *गारेंगा (बडेजिराखाल)* में बाढ़ आती ही है और उसके फलस्वरूप होने वाली क्षति तथा बाद में फैलने वाली महामारी गाँव वालों की नियति ही बन चुकी है। लाखों परिवार भाग्य के भरोसे इस विपदा को झेलने के लिये बाध्य होते हैं। सरकारी योजनाओं के सब्ज़ बाग़ तो बस दूर से ही दिखाई देते हैं।

*6.कृषि भूमि-*
छठी आवश्यकता है, वह है चकबंदी। खेतों का बिखराव कहीं-न-कहीं किसानों की सीमित शक्ति को भी बिखरा देता है। *गारेंगा* में गोचर-भूमि की व्यवस्था की भी बहुत आवश्यकता है।
पशुओं के ह्रास मे गोचर भूमि की ओर किसानों का ध्यान न होना इसका प्रमुख कारण है।     यदि समग्रत: देखा जाए तो *गारेंगा* की अनेक आवश्यकताएँ हैं, पर यदि ये छ: भी पूरी कर दी जाएँ तो *गारेंगा* की शक्ति में बहुत वृद्धि हो जायेगी।  *गारेंगा*  आज भी भारत के विकास का मूल आधार हैं और उनका विकास भारतीय अर्थव्यवस्था को और मज़बूत बना देगा। सरकारी योजनाओं के लाभ सामान्य ग्रामीणों तक सही रूप में पहुँच सकें, इसकी भी कोई संपुष्ट व्यवस्था तलाशनी होगी।
लेकिन वे भी किस सीमा तक उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनको योजनाबद्ध कैसे किया जाता है।

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Sunday, April 9, 2017

मेरा गाँव-गारेंगा

*लेख क्र.-9*

साथिओं आज का हमारा मुख्य बिंदु है-
*मेरा गांव-गारेंगा*.

गांव शब्द सुनते ही हम अपने मन में एक तस्वीर सी बना लेते हैं – कमर पे घड़ा रखे कुँए से पानी भरकर आती औरतें, खेतों से हल–बैल लेकर लौटते किसान, गांव के बाहर के मैदान में गिल्ली–डंडा खेलते बच्चे, दिए और चिमनी की रोशन में बच्च्चों को सुलातीं दादी मां, आँगन से उठाते चूल्हे के धुएँ की सोंधी खुशबू और दूर खेतों से आती किसी ट्यूबवेल एवं धान मील(चटया मील हल्बी-भतरी बोली मे) चलने की आवाज़|यदि हम भी मेट्रोपोलिटन सिटीज़ में पैदा हुए होते तो शायद गारेंगा की यही तस्वीर हमारे मन में भी रहती। और शायद यह अच्छा भी होता न? आख़िर अपना गारेंगा भी तो कभी ऐसा हुआ करता होगा।
मेरे गांव का नाम *'गारेंगा‘* है। यह छत्तीसगढ के बस्तर जिले में बसा 1000–15सौ की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। इसमें से तकरीबन 4 से 500 तो 0–10 साल से कम उम्र के बच्चे ही होंगे। सब प्रकृति की देन है!! गारेंगा आधुनिकीकरण की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। शहर या क़स्बा तो नहीं कह सकते पर ऊपर की तस्वीर के अनुसार गांव भी नहीं है। गांव से नज़दीकी बाज़ार तक पक्की सड़क, सरकारी हैंडपंप, बिजली और टेलीफोन के खम्भे (टावर), ईंट के मकान, क्रिकेट खेलते बच्चे *(मडा तालाब के ठिक आगे ट्रान्सफार्मर के नीचे बैपारी बाडी मे)* और गांव के बाहर के चौक पर पॉलिटिक्स पर बहस करते किसान। बीच बीच में किसी घर से मोबाइल के रिंग की आवाज़ भी आ जायेगी। इक्का–दुक्का जींस–टीशर्ट पहने लड़कियां भी दिख जायेंगी। भले ही चेहरे और शरीर के हाव–भाव वही सलवार कुरते वाले ही होंगे।
कभी–कभी लगता है की विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है।
हम अपनी पहचान, अपनी महक, अपना अस्तित्व खो रहे हैं। मुझे सरकारी हैंडपंप के पानी में पुराने कुँए के पानी वाली मिठास कभी नहीं मिली। गर्मी मे आंडी (कुम्हार के द्वारा बनाये जाने वाला मिट्टी का गोलाकार बर्तन) मे बना मंडया पेज पीने का आनंद आधुनिक स्टील के बर्तन में कभी नहीं मिला। और खेत से तुंरत लाई गयी ‘तोरी‘ और ‘लौकी‘ की सब्जी वाला स्वाद बज़क के पनीर और मशरूम में कभी नहीं मिला।

पर कुछ चीज़ें मुझे अब भी पहले जैसी लगती हैं। जब भी गाँव के सन्दर्भ मे सोचता हूँ तो कुछ चीजें ज़रूर करने की कोशिश करता हूँ। जैसे– सर्दियों में पुआल जलाकर आग तापना (सेंकना), घर में चौकी–पलंग वाले बिस्तर पर न सोकर धान के कड़ खुफा (धान को मिंजाई के बाद बचा हुआ अवशेष) पर बिस्तर बिछाकर सोना। सचमुच वह आनंद आपको इम्पोर्टेड गद्दों में भी नहीं मिलेगा। गर्मियों में मैं बिजली रहने पर भी घर के बाहर खुले आसमान के नीचे में सोना पसंद करता हूँ *(शुक्र है की यहाँ दिल्ली जितने मच्छर नहीं हैं)*। चांदनी रात में दूर कहीं रेडियो पर कोई पुराना गीत बज रहा हो और घर के बाहर जमीन पर पर लेटकर तारों के अंतरजाल को देखते रहने के आनद को शब्दों में समेत पाना सचमुच मुश्किल है।

कभी–कभी गारेंगा में तेज़ी से हो रहे बदलावों से मन क्षुब्ध तो होता है पर पता नहीं क्यों गारेंगा के प्रति लगाव और आकर्षण दिनों–दिन और बढ़ता ही जाता है। शायद गुजरते, फिसलते पलों को ज्यादा से ज्यादा समेट लेने, जी लेने, रोक लेने की ख्वाहिश और आने वाले वक्त के प्रति मन में छुपे भय के कारण ऐसा हो।

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आधुनिक युग के मनुष्य का अमानवीय दृष्टिकोण

जैसे-जैसे इंसान को किसी से मोहब्बत होने लगती है ठीक वैसे-वैसे नफरत बढ़ती जाती है। जब इंसान किसी को किसी से अपनेपन का अहसाह हो और उस...