Wednesday, June 28, 2017

आपकी ज़िंदगी अंधविश्वास की गिरफ्त में है?

अंधविश्वास, दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं। कभी-कभी तो उन्हें संस्कृति की धरोहर का एक हिस्सा मानकर अनमोल समझा जाता है। या फिर उनको महज़ जिज्ञासा की नज़र से देखा जाता है, और ज़िंदगी में रंग भरने के लिए ज़रूरी समझा जाता है। पश्‍चिमी देशों में अंधविश्वास को आम तौर पर गंभीरता से नहीं लिया जाता या उन पर पूरी तरह से यकीन नहीं किया जाता है। मगर अफ्रीका जैसे देशों में लोगों की ज़िंदगी पर अंधविश्वास की एक मज़बूत पकड़ है।

अफ्रीकी संस्कृति का अधिकतर हिस्सा अंधविश्वास की बुनियाद पर बना है। वहाँ की फिल्मों, रेडियो पर आनेवाले कार्यक्रम और साहित्यों में अकसर अंधविश्वास और जादू-टोना, पूर्वजों की उपासना और तावीज़ों जैसे अलौकिक विषयों पर ज़ोर दिया जाता है। लोगों पर अंधविश्वासों का इतना गहरा असर क्यों हैं, और इनकी शुरूआत कहाँ से हुई?

Tuesday, June 27, 2017

राम राज्य कभी नही आना चाहिए |

राम राज्य कभी नही आना चाहिए
                         ----- ओशो----

  राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना! एक बार जो भूल हो गई, हो गई। अब दुबारा मत करना।
   राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे, तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे ? किसलिए बिकेगा ? दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे, कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे। कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
  स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी। उनकी ही बेटियां होंगी। कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी। उसका तो स्वयंवर होता था। तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में ? और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे। क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनों, विशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थे, धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे!
  अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ। अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं। हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में, और राम के पहले भी--वधु का अर्थ होता था, खरीदी गई स्त्री! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। वधु नंबर दो की पत्नी थी। जैसे नंबर दो की बही होती है न, जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
  ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे! और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे। कुछ खास गजब के लोग नहीं थे। वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे।
   इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी! मगर यह जारी थी!
  रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर की बात थी, कि डाक्टर अम्बेडकर जैसा अतिशूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था! असंभव !! खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा, उबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था; यह उसका अपराध था। और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे। क्या करना है? शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है ? उसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...!
   तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा, तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर, भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा; मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी! और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात खराब हैं!'
   युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे ? और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं, सब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया! एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति!    
   उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है, तो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो! यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है? ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं, अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं।
   मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका आदर जारी रहा।
   भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे, दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं? तो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे? और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास था; पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे। और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है ?
    लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
   यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था। और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!'
   निर्मल घोष, एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे ? उस गरीब का कसूर क्या था ? अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो ? लेकिन नहीं, शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है !!!
   मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है, इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी।
    तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो! मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी।
   उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!
   जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा, निर्मल घोष, दे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया। 
             ---ओशो--
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"कहीं हम भूल न जाएँ

👉🏾हिन्दू धर्म में वर्ण, वर्ण में शूद्र, शूद्र में जाति, जाति में क्रमिक उंच नीच... और ब्राह्मण के आगे सारे नींच.. अब गर्व से कैसे कहें कि हम हिन्दू हैं  ???

साभार
-ओशो

Friday, June 23, 2017

मै नास्तिक हूँ!

मै नास्तिक हूँ,(Main Nastik Hoon)

मै नास्तिक हूँ,..........
मै नास्तिक हूँ,.........

मै नास्तिक हूँ,
क्यूंकि मै अपनी सफलता का क्ष्रेय नही देता उस मूर्ति को,
जिसे बनाया है हममे से ही किसी शक्श ने,
मै नास्तिक हूँ,
क्यूंकि मै परीक्षा देने से पहले दीपक नही जलाता पत्थरों केआगे,
कथा यज्ञ और पूजा मी हिस्सा नही लेता,

हो सकता है की मै नास्तिक ही हूँ,
क्यूंकि और आस्तिको की तरह,
नही देता हूँ भूखो को गाली,

मै सीता की बजाय झाँसी की रानी को पसंद करता हूँ,
क्यूंकि देखा है सीताओं को अग्नि परीक्षा देते हुए,
यदि रामायण पड़कर, और आस्तिक होकर,
पत्नी को धोखा और पिता को वृधाश्रम मे रखना है,
तो मै खुश हूँ की मै नास्तिक ही हूँ......

--अज्ञात

भीम आर्मी जिन्दाबाद

दलित आंदोलन को नया आयाम दे रही भीम आर्मी
सदियों से शोषित दलित अब जागरुक हो रहे हैं। उनकी राजनीतिक चेतना ने ऊंची जातियों को प्रभावित किया है और नब्बे के दशक के बाद प्रतिरोध के स्वर और मुखर हुए हैं। लेकिन चुनावी तिकड़मों में फ़ंसे दलित राजनीतिक चेतना ने उन्हें निराश भी किया है जो इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी अपमानजनक टिप्पणियों एवं अन्य प्रकार के भेदभाव के शिकार हैं। वह भी तब जबकि देश की राजनीति में उनका हस्तक्षेप निर्णायक बन चुका है। अपनी भीम आर्मी के सहारे चंद्रशेखर इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में दलित आंदोलन के नये स्वरुप को सामने लाने को सियासी गलियारे में प्रचलित तरीकों के जरिए प्रयास कर रहे हैं।

Tuesday, June 20, 2017

मै ब्राह्मण के विरोध मे नही ब्राह्मणवाद के विरोध मे हूँ!

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह नही है, कि भारत के सारे ब्राह्मणों को खत्म कर दिया जाए

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह भी नही  है, कि सारे ब्राह्मणों को भारत से भगा दिया जाए ।

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह है कि ब्राह्मणों को श्रेष्ठ मानने की परम्परा खत्म की जाए ।

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह है, कि अब SC, ST और OBC समाज के लोगों को नीच या अछुत ना माना जाए, बल्कि भारत के सभी लोगों को बराबर माना जाए ।

ब्राह्मणवाद के खात्मे अर्थ यह है कि जाति व्यवस्था, गौत्र व्यवस्था, ज्योतिष शास्त्र, पाखण्ड, नफ़रत और भेदभाव खत्म किया जाए ।

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह है, कि शादी के लिए लड़के और लड़की के गुण कर्म देखे जाएँ, अर्थात जाति, गौत्र, जन्मकुंडली जैसी चीजें ना देखी जाएँ ।

ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ यह है, कि जाति व्यवस्था के कारण पैदा हुई आर्थिक असमानता और शैक्षिक असमानता के खत्म होने तक, जाति के आधार वाले SC, ST और OBC के  आरक्षण का पूरी तरह सम्मान किया जाए ।

ब्लोगर सुरेन्द्र कुमार कन्नौजी (परिचय)

ब्लोगर:
सुरेन्द्र कुमार कन्नौजी
(https://surendrakannouji143.blogspot.com)

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मोबा. +91-9406171611, 09009099568

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पता:- ग्रा.+पोस्ट गारेंगा वि.ख. बकावन्ड जिला-बस्तर (छ.ग.) पिन-494224

डाक पता:
ग्रा+पोस्ट गारेंगा म.क्र. 84 व्हाया भानपुरी जिला-बस्तर (छ.ग.)
पिन-494224

नास्तिकवाद एक वैज्ञानीक तर्क

आस्तिक बनने के लिए खोई विद्नता की जरूरत नहीं है बस पोंगलपंथी पंडित,मौलवीय,पादरी या अन्य बकबासी धर्मगुरू की बात बिना समझे,बिना तर्क किये मान लीजिए बस हो गये आस्तिक,परन्तू नास्तिक बनने के लिए आपके पास विद्वता से परिपूर्ण नालेज रखना होगा,बिषयों के विचारणा में तर्क का सहारा लेना होगा,तथ्यों को विज्ञान की कसौटी पर कसना होगा तभी आप सच्चे वैज्ञानिक सोंच रखने वाले कहलायेंगें,जिसे पोंगलपंथी पंडित नास्तिक कहते हैं।

ब्लोगर:
https://surendrakannouji143.blogspot.com

सुरेन्द्र कुमार कन्नौजी

Sunday, June 18, 2017

अंधविश्वास एक बुरा रोग

हिंदू संस्कृति में यदि कोई व्यक्ति अपने मां बाप का नाम किसी कागज के टुकड़े पर लिखा हुआ देखता है, तो उसे उठाकर किसी ऐसी जगह रखता है ताकि उस पर पैरों में ना पड़े !

ऐसे ही भरत ने श्रीराम के खड़ाऊँ अपने सिर माथे पर लगाकर सिंहासन पर रखकर राम के ना होने पर उनके नाम से राज्य किया !

फिर क्यों जब श्रीराम के नाम से सेतु पुल के लिए श्रीराम का नाम लिखकर पत्थर तैराए गए तो उस पर सभी भालू...रीछ....बंदर....पैर रख-रखकर  लंका पहुंचे !

क्या तब उन्हें अपने श्री राम के नाम को पैरों तले रखने पर शर्म या ग्लानि नहीं हुई ? ऐसे में कहां गया उनका प्रभु श्रीराम के प्रति सम्मान और आराधना ?

Saturday, June 17, 2017

surendra kumar kannouji



भारत मे अंधविश्वास का मायाजाल

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हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठ पाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं, मगर यह सवाल जरूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता। 21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।
इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हल वे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढ़ंूढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजाल शहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं। ऐसे ही मीडिया भी एक तरफ अंधविश्वास की खबरों को दिखाकर उसका विरोध करता हैं और दूसरी तरफ अखबारों और चैनलों में तांत्रिकों, बाबाओं के विज्ञापन भी छापता और दिखाता है। मीडिया झूठे दावों को प्रचार-प्रसार भी करता है, क्योंकि सरकार को भी मीडिया से कर के रूप में आमदनी होती है। शायद सरकार भी इसीलिए चुप रहती है।
यही वजह है कि इन अंधविश्वास फैलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और इनका जाल अब अशिक्षित, गरीब लोगों के दायरे से बढ़कर शिक्षित युवाओं और विदेशों तक फैल चुका है। इनकी साइटें हैं, ब्लॉग हैं और जिन पर गरीबी, बीमारी को दूर करने से लेकर हर समस्या के समाधान की बात लिखी हुई है। साथ ही एक बड़ी फेहरिस्त उन दावों की है जिससे प्रभावित होकर लोग इनके जाल में फंसते हैं। अभी तक इनके दावे घरेलू कलह, बेटा पैदा कराने, मनचाहा प्यार पाने और दुश्मन के नाश तक सीमित थे, अब जमीन से जुड़े विवादों का निपटारा कराने, दुश्मन से बदला लेने और विदेशों में नौकरी दिलाने जैसी बातें भी लोगों को फंसाने का जरिया बन रही हैं। दुनिया में किसी के पास कोई भी दुख-समस्या हो, उनके पास हर परेशानी का इलाज तैयार रखा होता है। आश्चर्य यह है कि इस तंत्र-मंत्र के चक्कर में सिर्फ गरीब या अशिक्षित लोग ही नहीं पड़ रहे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न तबके के लोग भी बहुत बार ऐसे ही लोगों की शरण में जाकर अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं और ठगी के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों से ठगी के शिकार लोग कई बार शिकायत करना भी चाहते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि कहां जाएं और कैसे करें? कई बार तो लोग इन अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर कभी अपने तो कभी दूसरे के बच्चों की बलि तक दे देते हैं। ऐसी खबरें अखबारों में अक्सर हमें देख्रने को मिलती हैं।
कायदे से तो मीडिया को तंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जरिए फैलाए जा रहे अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन वह इन्हें बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में खुद जिम्मेदारी लोगों पर है, उन्हें समझना चाहिए कि जो लोग अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सके, उनमें दूसरों की दिक्कतों को दूर करने की सलाहियत कहां से समा गई।
अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में ऐसे आंदोलन चले थे, जिसमें अंधविश्वास, आडंबर का जमकर विरोध किया गया। सर सैयद अहमद खां ऐसी ही एक शख्सियत थे जिन्होंने मदरसों में दी जाने वाली अरबी-फारसी तालीम का विरोध इसलिए किया ताकि लोग दायरों से बाहर निकलें और नई तालीम हासिल करते हुए जमाने की जरूरतों को समझें। हालांकि अपने इन विचारों के लिए उन्हें मुसलिम समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरे बदलाव की बयार चली और लोगों ने तालीम लेनी शुरू की। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह अंधविश्वास है। आज के तकनीकी युग में भी यह लोगों के जहन में जगह बनाए हुए है। अखबारों में विज्ञापन देकर अंधविश्वास फैलाया जाता है। अंधविश्वास बना रहेगा तो ढोंगियों की जेब भी भारी रहेगी।

Tuesday, June 13, 2017



मैं ईश्वर और उसके दलालों से मेरे कुछ सवालों का जवाव चाहता हूँ--

1. क्या ईश्वर भूखा है,,
 जिसे हर वक़्त प्रसाद/भोग लगाना पड़ता है..??

2. क्या ईश्वर रिश्वतखोर है,,
जो दक्षिणा लेकर लोगों का काम करता है..??

3. क्या ईश्वर सुगला ( गन्दा ) है ,,,
जिसे अगरबत्ती इत्र, पुष्पों से महकाया जाता है..??

4. क्या ईश्वर आत्ममुघद् है ,,
जिसे अपनी अर्चना , इबादत करवाने का शौक है..???

5. क्या ईश्वर अपाहिज है,,,
 जो नहाने धोने पहनने के लिए भी दूसरों पर आश्रित रहता है..??

👉🏼 इसलिए ईश्वर को पूजना छोडो, उससे पूंछना शुरू करो..!!

👉🏼 कुछ सवाल आप भी इनमें जोड़ सकते हैं...!!



आधुनिक युग के मनुष्य का अमानवीय दृष्टिकोण

जैसे-जैसे इंसान को किसी से मोहब्बत होने लगती है ठीक वैसे-वैसे नफरत बढ़ती जाती है। जब इंसान किसी को किसी से अपनेपन का अहसाह हो और उस...