*लेख क्र.-10*
*वास्तविक प्रत्यक्ष अनुभव गारेंगा की मूलभूत आवश्यकताऐं*
प्रत्यक्ष अनुभव जाने बिना उन समस्याओं का हल नहीं ढूंढा जा सकता। इसलिये लिखित आँकड़े अथवा पंचवर्षीय योजनाएँ *गारेंगा* को समझने का सही मापदंड नहीं हो सकते। भारत जैसे देश में, जहाँ सांस्कृतिक, प्राकृतिक तथा भौगोलिक विविधताएँ हैं, प्रत्येक प्रदेश के गाँवों की समस्याओं में भिन्नता है, पर फिर भी लगभग 80 प्रतिशत गाँवों की मूलभूत आवश्यकताएँ समान ही हैं। भारत की विकास दर में गाँव कहीं उपेक्षित ही रहे हैं। अभावों तथा मौसम की मार ने इस कृषि प्रधान देश के किसानों व अन्य ग्रामवासियों को इस तरह की समस्याओं का शिकार बना दिया है कि वे मूल धारा से विच्छिन्न एक सूखी नदी का तट हो गये हैं। सरकारी स्तर पर उपलब्ध आँकड़े केवल सरकारी काग़ज़ों पर ही इन गाँवों की उन्नति दिखाते हैं। गारेंगा की आवश्यकताओं की चर्चा अथवा विचार-विमर्श करने के पश्चात अग्रलिखित आवश्यकताएँ नजर आई जो इस प्रकार है-
*1.शिक्षा प्रचार-*
सर्वप्रथम गारेंगा वालों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है, जिससे वे जागरूक हों और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। निश्चित रूप से सरकारी विद्यालयों तथा पाठशालाओं की आवश्यकता इसके साथ जुड़ी है। अनेक मोहल्ले में छोटे-छोटे स्कूल हैं, लेकिन उनकी दशा भी शोचनीय ही है। विशेष रूप से वे विद्यालय जो गारेंगा मुख्यमार्ग से कोषो दूर हैं, उनमें तो सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है। इसका मुख्य कारण विद्यालय का सुगम स्थानों पर न होना है। छोटे-छोटे बच्चों को विभिन्न बाधाएँ पार करते विद्यालय तक जाना पड़ता है। लड़कियों के लिये तो इतनी व्यवस्था भी विरले ही देखने को मिलती है।
मूलभूत सुविधाओं तथा इमारतों की कमी के चलते अध्यापक इन विद्यालयों में टिकना नहीं चाहते। कभी बाढ़, कभी वर्षा, कभी पाला तो कभी सर्दी के कारण ये विद्यालय बन्द रहते हैं। कभी-कभी नेताओं के दौरे के चलते कहीं जागृति आने की उम्मीद बंधती भी है तो शिक्षा के अभाव में वह सतत् जारी नहीं रह पाती। शैक्षणिक प्रचार के अभाव में लोग समस्याओं से तो परिचित हैं लेकिन उनके कारणों तक जाना उनके लिये असंभव प्राय: है। उनके जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं (भोजन, कृषि, स्वास्थ्य, परिवार) को समझाने के लिये पहले उन्हें शिक्षित करना अतिआवश्यक है।
*2.सड़क व्यवस्था-*
गारेंगा की दूसरी प्रमुख समस्या सड़कों की कमी है। गारेंगा में बसे लोग तो बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाते हैं क्योंकि यहाँ की परिवहन व्यवस्था बिल्कुल लचर है *(जैबेल से गारेंगा होते हुए केशरपाल तक का मुख्य मार्ग)*। इसका बड़ा कारण है, अच्छी सड़कों का न होना। इससे बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पहली तो यह कि जब लोग सड़कों के अभाव में शहरों तक पहुँच कर सभ्यता के विकास की झलक ही नहीं देख पाते तो उस विकास से प्रभावित होकर अपने जीवन-स्तर में सुधार करना कैसे संभव है?
जब नेतागण और समाज-सुधारक इन गाँवों तक पहुँच ही नहीं पाते तो जागृति की लहर यहाँ तक कैसे पहुँच सकती है। ग्रामवासियों के रोज़गार की समस्या के मूल में भी कहीं-न-कहीं सड़कों की यह लचर स्थिति ही है। अधिकतर किसान अपनी फसल को लेकर व्यापारिक मंडियों तक नहीं पहुँच पाते, और रात-दिन खेतों में परिश्रम करने के बावजूद इस परिश्रम का लाभ नहीं उठा पाते। इसके परिणामस्वरूप वे ग़रीबी और भुखमरी की मार झेलते हैं। यही कारण है कि आज भी किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले भारत में ही देखने को मिलते हैं।
जहाँ सड़कें नहीं हैं, वहाँ यातायात के साधन भी सदियों पुराने ही हैं, क्योंकि पगडंडियों पर बैलगाड़ियाँ ही चल पाती हैं। मौसम खराब होने पर, बारिश तथा बाढ़ जैसी स्थिति में तो इन गारेंगा तक पहुँचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। देश की आज़ादी के समय तो स्थिति और भी अधिक शोचनीय थी।
जहाँ कहीं जिला बोर्ड के सदस्य रहते हैं, वहाँ तो फिर भी कुछ सड़कों की मरम्मत की जाती है, बाकी जगह तो आज भी सड़क बनने की आस लिए बैठें हैं।
*3.जलाशय-*
जलाशय भी गाँव की एक मूल समस्या है। गाँवों में पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। पहले तो जनसंख्या के अनुपात को देखते हुए कुएँ वैसे ही कम हैं और जो हैं भी
जलाशय भी गाँव की एक मूल समस्या है। गाँवों में पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। पहले तो जनसंख्या के अनुपात को देखते हुए कुएँ वैसे ही कम हैं और जो हैं भी वे पक्की जगत् के बिना हैं। इतना ही नहीं, पक्की जगत् के कुएँ भी लोगों की अज्ञानता के कारण स्वच्छ नहीं हैं। बरतनों की अशुद्धता, कुएँ के पानी का पीने के अतिरिक्त अन्य कार्यों में प्रयोग करने तथा सफ़ाई न रखने के कारण कुओं का जल अस्वच्छ हो जाता है। जहाँ कहीं तालाब और जलाशय भी हैं, वहाँ भी स्थिति बेहतर नहीं है। खेतों की सिंचाई के लिये भी जगह-जगह जलाशय की आवश्यकता है। *गारेंगा* मे आज भी गाँव वालों को कोसों दूर से पानी लाना पड़ता है।
पहले की तरह परमार्थी लोग अब नहीं हैं।
*4.दवाखाने-*
*गारेंगा* की आवश्यकताओं सूची में चौथे स्थान पर दवाखाने है।
जो गाँव शहरों के निकट होते हैं, उनमें फिर भी दवाखानों की सुविधा उपलब्ध हो जाती है लेकिन *_Garenga_*में बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में समय रहते उचित चिकित्सा की सुविधा न मिलने के कारण पीड़ित की मौत तक हो जाती है। इतना ही नहीं, बहुत से बच्चे भी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में अकाल मृत्यु के शिकार बनते हैं। शहरों के निकट के गाँव में तो फिर भी सुविधाएँ मिलती हैं पर दूरवर्ती गाँवों में दवाखानों का अकाल है।
*5.बाढ़ से उत्पन्न समस्याएँ-*
गाँव की पाँचवीं आवश्यकत है -नदियों की बाढ़ और महामारियों से बचने के स्थायी उपायों की। यद्यपि किसानों के लिये वर्षा आज भी सिंचाई का प्रमुख स्रोत है, पर अतिवृष्टि उनके जीवन और कृषि के लिये साक्षात प्रलय का ही रूप होती है। प्रत्येक वर्ष *गारेंगा (बडेजिराखाल)* में बाढ़ आती ही है और उसके फलस्वरूप होने वाली क्षति तथा बाद में फैलने वाली महामारी गाँव वालों की नियति ही बन चुकी है। लाखों परिवार भाग्य के भरोसे इस विपदा को झेलने के लिये बाध्य होते हैं। सरकारी योजनाओं के सब्ज़ बाग़ तो बस दूर से ही दिखाई देते हैं।
*6.कृषि भूमि-*
छठी आवश्यकता है, वह है चकबंदी। खेतों का बिखराव कहीं-न-कहीं किसानों की सीमित शक्ति को भी बिखरा देता है। *गारेंगा* में गोचर-भूमि की व्यवस्था की भी बहुत आवश्यकता है।
पशुओं के ह्रास मे गोचर भूमि की ओर किसानों का ध्यान न होना इसका प्रमुख कारण है। यदि समग्रत: देखा जाए तो *गारेंगा* की अनेक आवश्यकताएँ हैं, पर यदि ये छ: भी पूरी कर दी जाएँ तो *गारेंगा* की शक्ति में बहुत वृद्धि हो जायेगी। *गारेंगा* आज भी भारत के विकास का मूल आधार हैं और उनका विकास भारतीय अर्थव्यवस्था को और मज़बूत बना देगा। सरकारी योजनाओं के लाभ सामान्य ग्रामीणों तक सही रूप में पहुँच सकें, इसकी भी कोई संपुष्ट व्यवस्था तलाशनी होगी।
लेकिन वे भी किस सीमा तक उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनको योजनाबद्ध कैसे किया जाता है।
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