Thursday, November 1, 2018

आधुनिक युग के मनुष्य का अमानवीय दृष्टिकोण

जैसे-जैसे इंसान को किसी से मोहब्बत होने लगती है ठीक वैसे-वैसे नफरत बढ़ती जाती है।
जब इंसान किसी को किसी से अपनेपन का अहसाह हो और उससे बातें करने लगे तो उससे दूरियां भी बढ़ती जाती है। लोग जब समझदार होने की कच्छी उम्र में होते है तब और भी अमानवीय रूप से बर्बर होते जाते हैं। ठीक वही हाल अभी हम मानवजाति भी लग रहा है। आप सब अच्छे लोगों के साथ रहें, अच्छा खाएं, स्वस्थ रहें और अपनी निष्पक्ष और बेबाकी सोच को एक नई आयाम/गति दें। इन्ही शुभकामनाओं के साथ सुप्रभात!

सुरेन्द्र कुमार कन्नौजी (नास्तिक उर्फ़ धर्ममुक्त) 2018©

Thursday, October 25, 2018

मेरी दस प्रतिज्ञाएँ

                 मेरी दस प्रतिज्ञाएँ
मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन भर दूसरों के आर्डर सुन कर धन कमाऊंगा। मैंने बचपन में ही फैसला कर लिया था कि-

1. आजीवन अविवाहित रहूँगा लेकिन अपनी पसन्द की महिलाओं से मित्रता रखूँगा मगर सेक्स के लिए विकल्प हमेशा बंद रखूंगा।

2. कभी बच्चे पैदा नहीं करूंगा क्योंकि मैं अमर नहीं हूँ, यदि बीच में मर गया तो उनको लावारिस नहीं छोड़ सकता और व्यस्तता के चलते उनकी परवरिश उचित ढंग से न कर सकूंगा।

3. वही खाऊंगा जो शरीर की कुदरती ज़रूरत है और जो मेरी नाक स्वीकार करेगी। इस तरह मैं लम्बा और स्वस्थ जीवन जी सकूँगा।

4. आधुनिक समाज नियमों में बंधा है अतः यातायात, कानून, कर्तव्य और अधिकारों का पूर्ण पालन करूँगा ताकि मुसीबत में न पड़ जाऊँ।

5. कम से कम कपड़े पहनूंगा ताकि शरीर को विटामिन D मिलने समेत कुदरती अहसास होता रहे कि जानवर कैसे जीवन जीते हैं और मैं मशीन न बन जाऊं। इससे असहाय लोगों की परेशानी समझने में आसानी हुई और मैं और अधिक मानवीय और दयालु बन गया।

6. मैंने तय किया कि उपर्युक्त 5 बिंदुओं से मेरा खर्च कम हो जाएगा और मैं यदि आज ही से धन कमाने और उसे जोड़ने के लिए प्रयास करूँ तो जब तक मुझे कमाने की आवश्यकता पड़ेगी तब तक मैं आर्थिक रूप से पहले से ही मजबूत हो चुका होऊंगा। इसके लिए मैंने बचपन में ही व्यापार किया और गुल्लकों में धन जोड़ा। बाद में बैंक में खाता खोल के उस धन को फिक्स किया और करता गया जब तक मुझे उसे खर्च करने की ज़रूरत न पड़ी। समय आया और मेरा जमा धन मुझे खुद कमा कर देने लगा।

7. आज मैं आत्मनिर्भर हूँ और अपनी शर्तों पर जीवन जीता हूँ। अब मैं धन के पीछे नहीं भागता बल्कि खुद को प्रसन्न रखने के लिए शौक पूरे करता हूँ। यद्यपि चूँकि मैं और अधिक दुनिया देखना चाहता हूँ इसलिये धन की आवश्यकता की पूर्ती हेतु भी अपने शौक प्रयोग करूँगा। लोगों के मन में अपनी छाप छोड़ पाता हूँ या नहीं यह तो प्रयोग का विषय है लेकिन उम्मीद है कि मैं अच्छा कर रहा हूँ।

8. समय आने पर मैं लेखन के क्षेत्र में और विज्ञान के क्षेत्र में अपने खोजे गए राज़ खोलूंगा परन्तु उनका उद्देश्य मानवता की भलाई के साथ-साथ सबके लिए प्रेरणास्रोत बनना भी होगा।

9. मैं अपने सभी उद्देश्यों में सफल होता रहा हूँ क्योंकि बचपन में मुझे भी मूर्ख कह कर स्कूल से निकाला जा रहा था और दया करके जो मुझे आगे बढ़ाया गया तभी से मैं समझ गया था कि यह दुनिया मेरे लायक नहीं। उसके लिए तो मैं नालायक ही रहूँगा। अतः जीवन अब सिर्फ़ मेरे अपने हाथ रहा। इसको कैसे जीना है अब मुझे ही तय करना था। अतः मैंने अपने मन की सुनी, करी और करता रहूँगा।

10. इस भूखी/गरीब दुनिया ने मुझसे सबकुछ छीना है लेकिन मेरी ज़िद है कि इसे सज़ा देने की जगह इतना प्रेम, महत्वपूर्ण विचार, खोजें, आविष्कार, साहित्य, धन कमाने के उपाय और योगदान देकर जाऊंगा कि फिर कोई धन और प्रेम से गरीब इस दुनिया में पैदा तो होगा लेकिन गरीब मरेगा नहीं। ~ सुरेन्द्र 2018©  2018/10/24 20:14

Note: यहाँ दी गई सभी प्रतिज्ञाएँ सांकेतिक हैं जिनका अन्य लाभों के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन भिन्न-भिन्न posts आप मेरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर देख सकते हैं।

― सुरेंद्र कुमार कन्नौजी (नास्तिक उर्फ धर्ममुक्त) ©2018

Tuesday, October 16, 2018

इश्क़ का सफ़र....

प्यार एक अनछुआ एहसास है जिसे सिर्फ महसूस किया जा
सकता है , वो एहसास जो हमारे सीने में दिल होने के
बात की पुष्टि करता है, वो एहसास जो इस बात
की भी पुष्टि करता है की मै
भी इंसान हूँ। प्यार एक दुआ की तरह
है जो कबूल हो जाये तो वरदान और जो न कबूल हो तो
ज़िन्दगी भर पिया जाने वाला ज़हर । इंतज़ार सिर्फ
उसी का रहता है जिस पर हमारा हक़ होता है। ऐसा
नहीं होता की हमने उससे पहले कोई
खूबसूरत चेहरा न देखा हो पर फिर भी दिल न जाने
क्यों उस एक पर आकार रुक जाता है। क्यों तमन्नाओ
की उड़ान अचानक और ज्यादा बढ जाती
है? क्यों दूर दूर रहकर भी हमेसा साथ रहते है?
क्यों बिना बातो के भी होंठो पर मुस्कान आ
जाती है?
कहते है दुनिया में जिस किसी ने भी सच्चा
प्यार किया वो मिल न सके तो इस दुनिया से ऊपर भी एक
दुनिया है जहाँ वो कभी जुदा ही
नहीं हो सकते। प्रेम बहुत ही छोटा
शब्द है मगर उसका अर्थ उतना ही महान है ।
मगर आज के समय में लोगो ने प्यार की परिभाषा को बदल
दिया है , प्यार उनके लिए एक खेल मात्र होकर रह गया है।
उन्हें प्यार के महत्व को समझना चाहिए, सच्चा प्यार करने वाले
को समझना चाहिए, प्यार करने वाले के जज्बात को समझना चाहिए,
प्यार की ताकत को समझना चाहिए, और धैर्य रखकर
उन्हें सच्चा प्यार करने वाले का साथ निभाना चाहिए।
आज की तेज रफ्तार से दौड़ती
जिन्दगी में व्यक्ति जब एक-दूसरे को पीछे
धकेलते हुए आगे बढ़ने की होड़ में संवेदनाओं को खोता
चला जा रहा है। रिश्तों और एहसासों से दूर, संपन्नता में क्षणिक
सुख खोजने के प्रयास में लगा रहता है। ऐसी स्थिति में
जहां प्यार बैंक-बैलेंस और स्थायित्व देखकर किया जाता है। वहां
सच्ची मोहब्बत, पहली नजर का प्यार
और प्यार में पागलपन जैसी बातें बेमानी
लगती हैं परंतु प्रेम शाश्वत है।
प्रेम सोच-समझकर की जाने वाली
चीज नहीं है। कोई कितना भी
सोचे, यदि उसे सच्चा प्रेम हो गया तो उसके लिए दुनिया
की हर चीज गौण हो जाती
है। प्रेम की अनुभूति विलक्षण है। प्यार कब हो
जाता है, पता ही नहीं चलता। इसका
एहसास तो तब होता है, जब मन सदैव किसी का
सामीप्य चाहने लगता है। उसकी
मुस्कुराहट पर खिल उठता है। उसके दर्द से तड़पने लगता है।
उस पर सर्वस्व समर्पित करना चाहता है, बिना किसी
प्रतिदान की आशा के।
           
  ―सुरेन्द्र कुमार कन्नौजी (नास्तिक उर्फ़ धर्ममुक्त)

Sunday, October 14, 2018

I'am Dharmamukt

सृष्टि निर्माता ईश्वर, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म के बाद स्वर्गनरक की बातें कर के असल में धर्म लोगों की जेब काटने वाले अनोखे तरीके ही बने रहे हैं। सभी धर्मों ने बड़ी चतुरता से आम व्यक्ति को अपने फंडे पुरोहितों के थोड़े ज्ञान के सहारे एक अनूठे जाल में फांस लिया, नतीजतन पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को जन्म से लेकर मृत्यु तक धर्म टैक्स देना पड़ रहा है। इसी टैक्स  को सुरक्षित करने के लिए धर्म के दुकानदारों ने मस्जिद, मठ, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे बनवाएं और उनमें नियुक्त लोगों को बैठेठाले हलवा पूरी भी दिलवाई, औरतें पहुंचवाईं, ताकत दी और सुरक्षा दी।
     धर्म की दुकानदारी में लगे लोग सदियों से अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए आमजन को बहकाते रहे हैं और सामाजिक प्रबंध के नाम पर प्रतिबंधों की लंबी फेहरिस्त बनाते रहे हैं। धर्मों ने केवल अपने को सुरक्षित रखने के लिए 3 - 4 हजार वर्षों में अरबो लोगों की हत्याएं कराई है। ज्यादातर युद्ध जर, जोरू और जमीन के लिए नहीं बल्कि धार्मिक सत्ता के लिए हुए हैं।

–यशवंत जोगी

https://twitter.com/surendrajdp

Friday, November 24, 2017

मेरे आस्तिक से नास्तिक तक का सफ़र.....


आस्तिक से नास्तिक तक का सफ़र......✍🏻
मेरे नास्तिक बने आज 4 वर्ष होने को है। पर 4 वर्ष पूर्व मैं जितना नास्तिक था उससे कहीं ज्यादा आज हूँ।
कई बार मैं नास्तिकता के सन्दर्भ में लिखने से डरता रहा। अत्यधिक मनुवादी और पाखंडियों ने मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पैरा डालने की कोशिश की, मेरी आवाज तक को दबाने की भी प्रयास किया गया।  पर मैं अपना नास्तिकता से परिपूर्ण भीड़मुक्त मार्ग में डटा रहा। मेरी नास्तिकता के शुरुवाती दौर में विभिन्न प्रकार के संघर्षों से झूझना पड़ा पर अब मेरा मार्ग और भी सहज और सरल हो गया। संविधान का अनुसरण करके मैं मानता हूँ की जब तक आपका दोष साबित नहीं हो जाता तब तक आप कभी दोषी नहीं हो सकते। शायद अब काल्पनिक ईश्वर नामक झूठ का अस्तित्व मिटने वाला है क्योंकि हम और आप जैसे नास्तिकों ने अब इस प्रतिस्पर्धा से परिपूर्ण दुनिया में पैंर पसार लिया है। अब लाख समस्या मेरे सामने खड़ी हो या कोई पुलिस का भय दिखाकर भयांकित करे, आतंकित करे, सुकरात की भांति जहर पीना पड़े या गौरी लंकेश की तरह गोली खाना पड़े मैं अपनी आवाज को कभी दबने नहीं दूँगा। अब मुझे नास्तिकता के इस सकारात्मक सोच और भीड़मुक्त मार्ग पर चलने से कोई रोक नहीं सकता।
          - सुरेंद्र कुमार कन्नौजी

Friday, September 15, 2017


''धर्म का वास्तविक तात्पर्य क्या है?''
धर्म का वास्तविक तात्पर्य है मानवीय चेतना मे ऐसी सत्य प्रवृतीयों का समावेश जो सदाचरण और कर्तव्यपालन के रुप मे वातावरण को उल्लासपूर्ण बनाने मे समर्थ हो |
सहिष्णुता, दया, प्रेम, विवेक, उद्धारता, संयम सेवा जैसी गुणो मे सच्ची धर्म निष्टा का परिचय मिलता है कर्तव्य परायणता और आदर्शवाद को जीवन मे प्रमुखता देने वाला व्यक्ति धर्मात्मा कहा जा सकता है किंतु आज तो इन सब की उपेक्षा करके मात्र पूजा-पाठ के ढकोसले मे निरर्थ रहना ही धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है |
धर्म तो कर्तव्य परायणता का पर्यायवाचक है धर्म निष्टा और कर्म निष्टा समान अर्थबोधक हैं |
दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाकर अपनी और अपने सम्पर्क क्षेत्र के समस्याओं का समाधान करने के क्षमता का विकास ही सच्ची धार्मिकता है |
इसी विशेषता के कारण धर्म तत्व को मानव जीवन मे सम्मान और ऊच स्थान मिला है |
धार्मिकता का तत्वज्ञान हमे कर्तव्य परायणता बने रहने और जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर आदर्शों की लडाई लड़ने का शौर्य, साहस प्रदान करता है |
*भैक्या यह उपलब्धियाँ जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त नही है?
धर्म और आध्यात्म को पलायनवाद का पर्यायी क्यों बनाया जाये?
जब तक की उसमे सज्जनता, शालीनता एवं प्रकृता प्रदान करने वाली विभूतियाँ आदी से अंत तक भरी पडी है |

आधुनिक युग के मनुष्य का अमानवीय दृष्टिकोण

जैसे-जैसे इंसान को किसी से मोहब्बत होने लगती है ठीक वैसे-वैसे नफरत बढ़ती जाती है। जब इंसान किसी को किसी से अपनेपन का अहसाह हो और उस...