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हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठ पाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं, मगर यह सवाल जरूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता। 21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।
इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हल वे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढ़ंूढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजाल शहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं। ऐसे ही मीडिया भी एक तरफ अंधविश्वास की खबरों को दिखाकर उसका विरोध करता हैं और दूसरी तरफ अखबारों और चैनलों में तांत्रिकों, बाबाओं के विज्ञापन भी छापता और दिखाता है। मीडिया झूठे दावों को प्रचार-प्रसार भी करता है, क्योंकि सरकार को भी मीडिया से कर के रूप में आमदनी होती है। शायद सरकार भी इसीलिए चुप रहती है।
यही वजह है कि इन अंधविश्वास फैलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और इनका जाल अब अशिक्षित, गरीब लोगों के दायरे से बढ़कर शिक्षित युवाओं और विदेशों तक फैल चुका है। इनकी साइटें हैं, ब्लॉग हैं और जिन पर गरीबी, बीमारी को दूर करने से लेकर हर समस्या के समाधान की बात लिखी हुई है। साथ ही एक बड़ी फेहरिस्त उन दावों की है जिससे प्रभावित होकर लोग इनके जाल में फंसते हैं। अभी तक इनके दावे घरेलू कलह, बेटा पैदा कराने, मनचाहा प्यार पाने और दुश्मन के नाश तक सीमित थे, अब जमीन से जुड़े विवादों का निपटारा कराने, दुश्मन से बदला लेने और विदेशों में नौकरी दिलाने जैसी बातें भी लोगों को फंसाने का जरिया बन रही हैं। दुनिया में किसी के पास कोई भी दुख-समस्या हो, उनके पास हर परेशानी का इलाज तैयार रखा होता है। आश्चर्य यह है कि इस तंत्र-मंत्र के चक्कर में सिर्फ गरीब या अशिक्षित लोग ही नहीं पड़ रहे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न तबके के लोग भी बहुत बार ऐसे ही लोगों की शरण में जाकर अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं और ठगी के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों से ठगी के शिकार लोग कई बार शिकायत करना भी चाहते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि कहां जाएं और कैसे करें? कई बार तो लोग इन अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर कभी अपने तो कभी दूसरे के बच्चों की बलि तक दे देते हैं। ऐसी खबरें अखबारों में अक्सर हमें देख्रने को मिलती हैं।
कायदे से तो मीडिया को तंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जरिए फैलाए जा रहे अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन वह इन्हें बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में खुद जिम्मेदारी लोगों पर है, उन्हें समझना चाहिए कि जो लोग अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सके, उनमें दूसरों की दिक्कतों को दूर करने की सलाहियत कहां से समा गई।
अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में ऐसे आंदोलन चले थे, जिसमें अंधविश्वास, आडंबर का जमकर विरोध किया गया। सर सैयद अहमद खां ऐसी ही एक शख्सियत थे जिन्होंने मदरसों में दी जाने वाली अरबी-फारसी तालीम का विरोध इसलिए किया ताकि लोग दायरों से बाहर निकलें और नई तालीम हासिल करते हुए जमाने की जरूरतों को समझें। हालांकि अपने इन विचारों के लिए उन्हें मुसलिम समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरे बदलाव की बयार चली और लोगों ने तालीम लेनी शुरू की। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह अंधविश्वास है। आज के तकनीकी युग में भी यह लोगों के जहन में जगह बनाए हुए है। अखबारों में विज्ञापन देकर अंधविश्वास फैलाया जाता है। अंधविश्वास बना रहेगा तो ढोंगियों की जेब भी भारी रहेगी।
हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठ पाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं, मगर यह सवाल जरूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता। 21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।
इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हल वे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढ़ंूढ़ने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजाल शहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं। ऐसे ही मीडिया भी एक तरफ अंधविश्वास की खबरों को दिखाकर उसका विरोध करता हैं और दूसरी तरफ अखबारों और चैनलों में तांत्रिकों, बाबाओं के विज्ञापन भी छापता और दिखाता है। मीडिया झूठे दावों को प्रचार-प्रसार भी करता है, क्योंकि सरकार को भी मीडिया से कर के रूप में आमदनी होती है। शायद सरकार भी इसीलिए चुप रहती है।
यही वजह है कि इन अंधविश्वास फैलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और इनका जाल अब अशिक्षित, गरीब लोगों के दायरे से बढ़कर शिक्षित युवाओं और विदेशों तक फैल चुका है। इनकी साइटें हैं, ब्लॉग हैं और जिन पर गरीबी, बीमारी को दूर करने से लेकर हर समस्या के समाधान की बात लिखी हुई है। साथ ही एक बड़ी फेहरिस्त उन दावों की है जिससे प्रभावित होकर लोग इनके जाल में फंसते हैं। अभी तक इनके दावे घरेलू कलह, बेटा पैदा कराने, मनचाहा प्यार पाने और दुश्मन के नाश तक सीमित थे, अब जमीन से जुड़े विवादों का निपटारा कराने, दुश्मन से बदला लेने और विदेशों में नौकरी दिलाने जैसी बातें भी लोगों को फंसाने का जरिया बन रही हैं। दुनिया में किसी के पास कोई भी दुख-समस्या हो, उनके पास हर परेशानी का इलाज तैयार रखा होता है। आश्चर्य यह है कि इस तंत्र-मंत्र के चक्कर में सिर्फ गरीब या अशिक्षित लोग ही नहीं पड़ रहे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न तबके के लोग भी बहुत बार ऐसे ही लोगों की शरण में जाकर अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं और ठगी के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों से ठगी के शिकार लोग कई बार शिकायत करना भी चाहते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि कहां जाएं और कैसे करें? कई बार तो लोग इन अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर कभी अपने तो कभी दूसरे के बच्चों की बलि तक दे देते हैं। ऐसी खबरें अखबारों में अक्सर हमें देख्रने को मिलती हैं।
कायदे से तो मीडिया को तंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जरिए फैलाए जा रहे अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन वह इन्हें बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में खुद जिम्मेदारी लोगों पर है, उन्हें समझना चाहिए कि जो लोग अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सके, उनमें दूसरों की दिक्कतों को दूर करने की सलाहियत कहां से समा गई।
अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में ऐसे आंदोलन चले थे, जिसमें अंधविश्वास, आडंबर का जमकर विरोध किया गया। सर सैयद अहमद खां ऐसी ही एक शख्सियत थे जिन्होंने मदरसों में दी जाने वाली अरबी-फारसी तालीम का विरोध इसलिए किया ताकि लोग दायरों से बाहर निकलें और नई तालीम हासिल करते हुए जमाने की जरूरतों को समझें। हालांकि अपने इन विचारों के लिए उन्हें मुसलिम समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरे बदलाव की बयार चली और लोगों ने तालीम लेनी शुरू की। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह अंधविश्वास है। आज के तकनीकी युग में भी यह लोगों के जहन में जगह बनाए हुए है। अखबारों में विज्ञापन देकर अंधविश्वास फैलाया जाता है। अंधविश्वास बना रहेगा तो ढोंगियों की जेब भी भारी रहेगी।
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