''धर्म का वास्तविक तात्पर्य क्या है?''
धर्म का वास्तविक तात्पर्य है मानवीय चेतना मे ऐसी सत्य प्रवृतीयों का समावेश जो सदाचरण और कर्तव्यपालन के रुप मे वातावरण को उल्लासपूर्ण बनाने मे समर्थ हो |
सहिष्णुता, दया, प्रेम, विवेक, उद्धारता, संयम सेवा जैसी गुणो मे सच्ची धर्म निष्टा का परिचय मिलता है कर्तव्य परायणता और आदर्शवाद को जीवन मे प्रमुखता देने वाला व्यक्ति धर्मात्मा कहा जा सकता है किंतु आज तो इन सब की उपेक्षा करके मात्र पूजा-पाठ के ढकोसले मे निरर्थ रहना ही धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है |
धर्म तो कर्तव्य परायणता का पर्यायवाचक है धर्म निष्टा और कर्म निष्टा समान अर्थबोधक हैं |
दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाकर अपनी और अपने सम्पर्क क्षेत्र के समस्याओं का समाधान करने के क्षमता का विकास ही सच्ची धार्मिकता है |
इसी विशेषता के कारण धर्म तत्व को मानव जीवन मे सम्मान और ऊच स्थान मिला है |
धार्मिकता का तत्वज्ञान हमे कर्तव्य परायणता बने रहने और जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर आदर्शों की लडाई लड़ने का शौर्य, साहस प्रदान करता है |
*भैक्या यह उपलब्धियाँ जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त नही है?
धर्म और आध्यात्म को पलायनवाद का पर्यायी क्यों बनाया जाये?
जब तक की उसमे सज्जनता, शालीनता एवं प्रकृता प्रदान करने वाली विभूतियाँ आदी से अंत तक भरी पडी है |
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